13. अवस्था–त्रय (Avastha Traya – तीन अवस्थाएँ)
स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर के विवेचन के पश्चात् अब चेतना की तीन अवस्थाओं का वर्णन किया जाता है।
13.1 अवस्थात्रयं किम्। तीन अवस्थाएं क्या है?
13.2 जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थाः। ये हैं — जाग्रत (waking), स्वप्न (dream) और सुषुप्ति (deep sleep) अवस्थाएँ।
13.3 जाग्रत अवस्था (Waking State)
13.3 जाग्रदवस्था का? जाग्रत अवस्था क्या है?
13.4 श्रोत्रादिज्ञानेन्द्रियैः शब्दादिविषयैश्च ज्ञायते इति यत् सा जाग्रदवस्था।
जिस अवस्था में श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा शब्द आदि विषयों का ज्ञान होता है — वही जाग्रत अवस्था है।
13.5 स्थूल शरीराभिमानी आत्मा विश्व इत्युच्यते।
जो आत्मा स्थूल शरीर से तादात्म्य करता है, उसे विश्व कहा जाता है।
जाग्रत अवस्था वह है जिसमें आत्मा स्थूल शरीर से अभिमानित होकर बाह्य जगत का अनुभव करता है। इस अवस्था में मनुष्य इन्द्रियों (श्रवण, स्पर्श, दृष्टि, रसना और घ्राण) के माध्यम से ध्वनि, रूप, स्वाद, स्पर्श और गंध आदि विषयों का अनुभव करता है।
जाग्रत अवस्था में व्यक्ति की सभी शक्तियाँ सक्रिय रहती हैं और वह पूर्ण रूप से कार्यशील होता है। इस अवस्था में आत्मा स्थूल शरीर से तादात्म्य करती है और उसे विश्व (Vishwa) कहा जाता है।
हालाँकि अनुभव का आधार स्थूल शरीर है, परंतु सूक्ष्म और कारण शरीर भी इस अवस्था में उपलब्ध रहते हैं।
13.6 स्वप्न अवस्था (Dream State)
13.6 स्वप्नावस्था केति चेत्? स्वप्न अवस्था क्या है?
जाग्रदवस्थायां यद् दृष्टं यद् श्रुतं तज्जनि तवासनया निद्रासमये यः प्रपञ्चः प्रतीयते सा स्वप्नावस्था।
जाग्रत अवस्था में जो कुछ देखा या सुना गया है, उन्हीं के संस्कारों (वासना) से निद्रा के समय जो प्रपंच (जगत्) अनुभव होता है — वही स्वप्न अवस्था कहलाती है।
13.7 सूक्ष्मशरीराभिमानी आत्मा तैजस इत्युच्यते।
जो आत्मा सूक्ष्म शरीर से तादात्म्य करता है, उसे तैजस कहा जाता है।
स्वप्न अवस्था वह है जिसमें आत्मा मन अथवा सूक्ष्म शरीर से तादात्म्य करता है। इस अवस्था में मन, जाग्रत अवस्था में देखे-सुने या सोचे गए अनुभवों (वासना) के आधार पर एक नया जगत् रचता है।
जाग्रत अवस्था में प्राप्त संस्कार स्वप्न में एक नए रूप में प्रकट होते हैं। कई बार विभिन्न अनुभव आपस में मिलकर नए और अजीब दृश्य या घटनाओं का निर्माण करते हैं, जो जाग्रत अवस्था से देखे जाएँ तो अवास्तविक प्रतीत होते हैं।
स्वप्न और जाग्रत अवस्था साथ-साथ नहीं रह सकतीं — जब तक जाग्रत व्यक्ति है, तब तक स्वप्न नहीं, और जब तक स्वप्न है, तब तक जाग्रत का अनुभव नहीं।
स्वप्न अवस्था में आत्मा तैजस कहलाती है। यह सम्पूर्ण जगत् मन के विचारों के प्रकाश से ही प्रकाशित रहता है। स्वप्न के विषयों का कोई वस्तुगत (objective) अस्तित्व नहीं होता, वे केवल मानसिक प्रकाश (चेतना की ज्योति) से ही प्रकाशित होते हैं।
13.8 सुषुप्ति अवस्था (Deep Sleep State)
13.8 अतः सुषुप्त्यवस्था का? तब सुषुप्ति अवस्था क्या है?
13.9 अहं किमपि न जानामि सुखेन मया निद्राऽनुभूयत इति सुषुप्त्यवस्था।
वह अवस्था जिसके बारे में जागने पर मनुष्य कहता है — “मैं कुछ भी नहीं जानता था; मैंने सुखपूर्वक नींद का अनुभव किया” — वही सुषुप्ति अवस्था है।
13.10 कारणशरीराभिमानी आत्मा प्राज्ञ इत्युच्यते।
जो आत्मा कारण शरीर से तादात्म्य करता है, उसे प्राज्ञ कहा जाता है। (प्रायः अज्ञ — लगभग अज्ञानी)।
मनुष्य जाग्रत और स्वप्न अवस्थाओं में विशेष-विशेष अनुभव करता है। परंतु सुषुप्ति अवस्था में कोई विशेष अनुभव नहीं होता। इस अवस्था में सोने वाला कुछ नहीं जानता, अर्थात् अज्ञान रहता है। लेकिन साथ ही वह स्थूल और सूक्ष्म शरीर की सीमाओं से मुक्त होता है, इसलिए इस अवस्था में आनंद (आनंदमय शांति) का अनुभव होता है।
हालाँकि इस आनंद का ज्ञान नहीं होता, क्योंकि मन उस समय अनुपस्थित होता है। फिर भी आत्मा की चेतना बनी रहती है — इसलिए जागने पर व्यक्ति स्मरण करता है कि “मैंने सुखपूर्वक नींद का अनुभव किया” और सोने से पहले की स्मृतियाँ भी लौट आती हैं।
इस प्रकार आत्मा का अस्तित्व और स्मृति की निरंतरता बनी रहती है।
सुषुप्ति अवस्था में आत्मा कारण शरीर से तादात्म्य करती है और केवल इतना ही अनुभव रहता है — “मैं कुछ नहीं जानता”। इस अवस्था में आत्मा को प्राज्ञ कहा जाता है, क्योंकि वह पूरी तरह अज्ञानी नहीं, बल्कि लगभग अज्ञानी है।
निष्कर्ष: इस प्रकार चेतना की तीन अवस्थाओं — जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति — का वर्णन हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि आत्मा हर अवस्था में किसी न किसी शरीर (स्थूल, सूक्ष्म या कारण) से तादात्म्य करती है और उसी के अनुसार उसे विश्व, तैजस या प्राज्ञ कहा जाता है।
परंतु वास्तव में आत्मा तीनों अवस्थाओं में एक ही है, सदैव विद्यमान है और इन सबकी साक्षी है।
14. पञ्च कोशाः (Panch Kosa)
पाँच कोशों का आगे वर्णन किया गया है।
14.1 पञ्च कोशाः के? पाँच कोश क्या हैं?अन्नमयः प्राणमयः मनोमयः विज्ञानमयः आनन्दमयश्चेति।
14.1 पाँच कोश क्या हैं?
पाँच कोश ये हैं — अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश।
“कोश” का अर्थ यहाँ वास्तव में किसी आवरण से नहीं है, क्योंकि सर्वव्यापक आत्मा को सीमित स्थूल पदार्थ द्वारा ढका नहीं जा सकता। “कोश” का तात्पर्य है — अज्ञानवश आत्मा के साथ शरीर का तादात्म्य (identification)। ऐसा प्रतीत होता है मानो आत्मा किसी कोश से आच्छादित है।
14.2 अन्नमय कोश (Food Sheath)
14.2 अन्नमयः कः?
अन्नरसेनैव भूत्वा अन्नरसेनैव वृद्धि प्राप्य अन्नरूपपृथिव्यां यद्विलीयते तदन्नमयः कोशः स्थूलशरीरम्।
14.2 अन्नमय कोश क्या हैं?
वह जो अन्नरस से उत्पन्न होता है, अन्नरस से ही वृद्धि पाता है और अंत में अन्नरूप पृथ्वी में विलीन हो जाता है — वही अन्नमय कोश है। यही स्थूल शरीर है।
स्थूल शरीर को अन्नमय कोश कहा जाता है। इसे ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि यह शरीर माता-पिता द्वारा खाए गए अन्न के सार से उत्पन्न हुआ है। यह आगे भोजन के द्वारा ही पल्लवित और पोषित होता है तथा मृत्यु के पश्चात् पृथ्वी में मिलकर फिर अन्न का रूप धारण कर लेता है।
आत्मा जब स्थूल शरीर से तादात्म्य करता है, तो अन्नमय कोश का आभास होता है।
यहाँ “मय” (जैसे अन्नमय) का अर्थ है विकार या परिवर्तन। अतः अन्नमय का अर्थ है — जो अन्न के विकार से बना हो। यही “मय” शब्द का अर्थ अगले तीन कोशों (प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय) में भी लागू होता है।
14.3 प्राणमय कोश (Vital Air Sheath)
14.3 प्राणमयः कः? प्राणाद्याः पञ्चवायवः वागादीन्द्रियपञ्चकं प्राणमयः कोशः।
14.3 प्राणमय कोश क्या हैं?
प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान — ये पाँच प्राणवायु तथा वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ — मिलकर प्राणमय कोश कहलाती हैं।
शरीर में पाँच प्राणवायु की क्रियाएँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाणी, हाथ, पाँव, गुदा, उपस्थ) मिलकर प्राणमय कोश बनाती हैं।
जब आत्मा इन प्राण क्रियाओं से तादात्म्य करता है (जैसे — “मैं भूखा हूँ, मुझे प्यास लगी है”), तब प्राणमय कोश का अनुभव होता है। इस अवस्था में आत्मा स्वयं को प्राण मान लेता है।
पाँच प्राणों के कार्य:
- प्राण : श्वसन (Respiration)
- अपान : उत्सर्जन / निष्कासन (Evacuation / Rejection)
- व्यान : परिसंचरण (Circulation)
- उदान : प्रतिक्रिया / बाहर निकालना (Reaction, e.g. उल्टी, आँसू)
- समान : पाचन / अवशोषण (Assimilation / Digestion)
विशेष रूप से उदान वायु शरीर की भीतरी प्रतिक्रिया का प्रतिनिधित्व करती है — जैसे उल्टी होना, रोना आदि। यह मृत्यु के समय अत्यधिक सक्रिय हो जाती है।
पाँचों कर्मेन्द्रियाँ (वाणी, हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ) भी प्राणमय कोश में सम्मिलित हैं।
14.4 मनोमय कोश (Mental Sheath)
14.4 मनोमयः कोशः कः?
मनश्च ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं मिलित्वा यो भवति स मनोमयः कोशः।
14.4 मनोमय कोश क्या हैं?
मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मिलकर मनोमय कोश कहलाते हैं।
मन बाहरी जगत से आने वाले विषयों को ज्ञानेन्द्रियों (कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक) के माध्यम से ग्रहण करता है। यह भावनाओं और संवेदनाओं का भी केंद्र है।
मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मिलकर मनोमय कोश बनाते हैं। आत्मा जब इनसे तादात्म्य करता है, तब “मानसिक आवरण” का अनुभव होता है — जैसे, मैं प्रसन्न हूँ, दुखी हूँ, क्रोधित हूँ इत्यादि।
14.5 विज्ञानमय कोश (Intellectual Sheath)
14.5 विज्ञानमयः कः? बुद्धिज्ञानेन्द्रियपञ्चकं मिलित्वा यो भवति स विज्ञानमयः कोशः।
14.5 विज्ञानमय कोश क्या हैं?
बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मिलकर विज्ञानमय कोश कहलाती हैं।
बुद्धि का कार्य है — निर्णय लेना और कर्तृत्व का अहंकार (अहंकार भाव) उत्पन्न करना।
मन और बुद्धि वास्तव में एक ही विचारशक्ति के दो पक्ष हैं —
- जब वह भावनाओं और द्वन्द्वों में डोलता है, तो उसे मन कहते हैं।
- जब वह किसी बात का निर्णय करता है, तो उसे बुद्धि कहते हैं।
बुद्धि का स्वरूप है — ज्ञान या बोध (cognition), जबकि मन का स्वरूप है — भाव या संकल्प (volition)।
बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मिलकर विज्ञानमय कोश बनाती हैं। आत्मा जब इससे तादात्म्य करता है, तो वह अपने को “ज्ञाता” और “कर्ता” मानने लगता है — जैसे, मैं जानता हूँ, मैं करता हूँ इत्यादि।
14.6 आनन्दमय कोश (Bliss Sheath)
14.6 आनन्दमयः कः? एवमेव कारणशरीरभूताविद्यास्थमलिनसत्वं प्रियादिवृत्तिसहितं सत् आनन्दमयः कोशः।।
14.6 आनन्दमय कोश क्या हैं? जो अविद्या स्वरूप कारण शरीर में स्थित है, जो मलिन सत्त्वप्रधान है और जो प्रिय, मोद, प्रमोद जैसी वृत्तियों से संयुक्त है, वही आनन्दमय कोश कहलाता है।
गहन निद्रा (सुषुप्ति) की अवस्था में जो अज्ञान (अविद्या) और आनन्द का अनुभव होता है, वही आनन्दमय कोश है।
यहाँ “मय” प्रत्यय परिपूर्णता या प्रधानता के अर्थ में है, न कि परिवर्तन (modification) के अर्थ में जैसा अन्य कोशों में देखा गया।
गहन निद्रा में व्यक्ति स्थूल और सूक्ष्म शरीर से अनभिज्ञ रहता है, परंतु अस्तित्व में प्रिय, मोद और प्रमोद जैसी वृत्तियाँ बनी रहती हैं।
- प्रिय वृत्ति : जब किसी प्रिय वस्तु के स्मरण मात्र से आनन्द अनुभव होता है।
- मोद वृत्ति : जब प्रिय वस्तु प्राप्त हो जाती है तो जो आनन्द होता है।
- प्रमोद वृत्ति : जब उस प्रिय वस्तु का उपभोग या अनुभव किया जाता है, तब जो गहन आनन्द मिलता है।
इस प्रकार जो कारण शरीर है, वही आनन्दमय कोश कहलाता है।
14.7 एतत्कोशपञ्चकम् यह पांच कोश हैं:
प्रत्येक कोश ऐसा प्रतीत होता है मानो वह आत्मा (आत्मन्) को आवृत किए हुए है। वास्तव में आत्मा अपनी स्वाभाविक सत्य स्वरूप में प्रकट नहीं हो पाती क्योंकि मनुष्य अपने “मैं” (अहं) को इन कोशों के तत्वों से एकाकार कर लेता है।
यह ध्यान देने योग्य है कि ये पाँच कोश किसी प्रगतिशील क्रम में नहीं हैं (जैसे कि एक के भीतर दूसरा, और उसके भीतर तीसरा आदि)। प्रत्येक कोश स्वतंत्र रूप से आत्मा को आच्छादित करता है।
मनुष्य का “मैं” जब-जब शरीर, मन या बुद्धि आदि के साथ तादात्म्य करता है, तब-तब आत्मा उस विशेष कोश से ढकी हुई प्रतीत होती है।
ये पाँच कोश वास्तव में मानव के पाँच सामान्य और सार्वभौम भ्रान्तियों (universal errors) का प्रतिनिधित्व करते हैं —
- शरीर के साथ तादात्म्य,
- प्राण के साथ तादात्म्य,
- मन के साथ तादात्म्य,
- बुद्धि के साथ तादात्म्य,
- और कारण शरीर (आनन्दमय कोश) के साथ तादात्म्य।
इस प्रकार आत्मा अपनी शुद्ध, निरावरण स्थिति में रहते हुए भी इन पाँच आवरणों के कारण अप्रकट प्रतीत होती है।
15. पञ्चकोशातीत
15. मदीयं शरीरं मदीयाः प्राणाः मदीयं मनश्च मदीया बुद्धिर्मदीयं ज्ञानमिति स्वेनैव ज्ञायते तद्यथा-मदीयत्वेन ज्ञातं कटककुण्डल गृहादिकं स्वस्माद्रिन्नंतथा पञ्चकोशादिकं स्वस्माद्रिन्नं मदीयत्वेन ज्ञातमात्मा न भवति ।।
आत्मा को पञ्चकोशातीत कहा गया है — अर्थात् वह पाँचों कोशों से परे है। वह किसी भी कोश से एकाकार नहीं होता, किन्तु प्रत्येक कोश में व्याप्त रहता है।
जैसे चूड़ी, कुण्डल, घर आदि वस्तुएँ “मेरा” कहलाती हैं, वैसे ही “मेरा शरीर, मेरे प्राण, मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा ज्ञान” भी आत्मा के द्वारा ही “मेरा” रूप में जाना जाता है।
लेकिन जिस वस्तु को “मेरा” कहा जाता है, वह वस्तु स्वयं “मैं” नहीं हो सकती। इस प्रकार पाँचों कोश आत्मा से भिन्न हैं।
महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त:
- ज्ञाता (The Knower) सदा ज्ञेय (The Known) से भिन्न होता है।
- जैसे आभूषण या घर मेरे हैं, पर मैं उनसे भिन्न हूँ, उसी प्रकार पाँच कोश भी आत्मा से भिन्न हैं।
- आत्मा स्वयं साक्षी है, वह इन कोशों का जानने वाला है, किन्तु इनमें से कोई भी आत्मा नहीं है।
सीमितता का अनुभव:
जब मनुष्य स्वयं को इन कोशों से जोड़ लेता है, तब वह उनकी सीमाओं से बँध जाता है।
- यदि मैं अपने को घर मान लूँ, तो मेरी गतिशीलता घर की चारदीवारी तक सीमित हो जाती है।
- यदि मैं अपने को शरीर मान लूँ, तो शरीर की रोग, वृद्धावस्था, मृत्यु जैसी सीमाएँ मेरी हो जाती हैं।
- यदि मैं अपने को मन मान लूँ, तो उसकी भावनाएँ — सुख, दुःख, क्रोध, मोह — मेरी बन जाती हैं।
- यदि मैं अपने को बुद्धि मान लूँ, तो उसकी अज्ञानता और भ्रान्ति भी मेरी प्रतीत होने लगती है।
अतः आत्मा इन पाँचों कोशों से भिन्न, स्वतंत्र और परे है। वह केवल साक्षी है — न सीमित, न आवृत।
16.1 आत्मा तर्हि कः? सच्चिदानन्दस्वरूपः।
16.1 तब आत्मा क्या है? आत्मा सत्-चित्-आनन्द स्वरूप है।
अब तक आचार्य ने आत्मा को नकारात्मक ढंग से समझाया—आत्मा क्या नहीं है। वह न पाँच कोश है, न तीन शरीर है और न ही तीन अवस्थाएँ। इस प्रकार शिष्य के मन में आत्मा के विषय में जो भी भ्रांत धारणाएँ हो सकती थीं, उन्हें हटाया गया। अब आत्मा के सकारात्मक स्वरूप का वर्णन किया जा रहा है। यदि पहले ही आत्मा के सकारात्मक गुण बताए जाते, बिना नकारात्मक स्पष्टता के, तो शिष्य भ्रमित होकर आत्मा को किसी और वस्तु के साथ मिला बैठता।
16.2 सत्किम्? कालत्रयेऽपि तिष्ठतीति सत्।
16.2 सत् क्या है? — जो तीनों कालों (भूत, वर्तमान और भविष्य) में अपरिवर्तित रहता है वही सत् है।
‘सत्’ वह तत्व है जो सदैव अपरिवर्तित रहता है—अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों में। उदाहरण के लिए—घड़ा मिट्टी से बना है। घड़े का सत्-स्वरूप मिट्टी है, जो घड़ा बनने से पहले भी थी, घड़े में रहते हुए भी है और घड़ा टूट जाने के बाद भी रहेगी। प्रत्येक नश्वर वस्तु किसी मूल और शाश्वत तत्व से बनी होती है। जगत नश्वर है, इसलिए यह भी किसी शाश्वत और मूल तत्व से बना होगा। वही शाश्वत तत्व आत्मा है—जो था, है और रहेगा—चाहे जगत हो या न हो। यही आत्मा की कालातीतता सत् कहलाती है।
16.3 चित्किम्? ज्ञानस्वरूपः।
16.3 चित् क्या है? — चित् ज्ञानस्वरूप है।
‘चित्’ का अर्थ है शुद्ध चेतना। यह सभी अनुभव-अवस्थाओं में विद्यमान है। आत्मस्वरूप चित् को जान लेने से मनुष्य तुरंत सिद्धि प्राप्त करता है। चित् भी तीनों कालों में विद्यमान रहता है, इसलिए इसका स्वरूप भी सत् ही है।
16.4 आनन्दः कः? सुखस्वरूपः ।
16.4 आनन्द क्या है? — आनन्द सुखस्वरूप है।
‘आनन्द’ वह अनुभव है जो मनुष्य को स्वयं के साथ होने पर प्राप्त होता है। जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु की इच्छा करता है और वह इच्छा पूरी हो जाती है, तब जो क्षणिक सुख मिलता है, वह वस्तुतः स्वयं के साथ एकत्व का अनुभव है। उस क्षण वह व्यक्ति अपने आप से पूर्ण संतुष्ट होता है और कुछ और होने की इच्छा नहीं करता। यही अवस्था आनन्द है।
आनन्द मनुष्य का मूलस्वभाव है। जो वस्तुएँ थोड़े समय के लिए सुख देती प्रतीत होती हैं, वे केवल साधन मात्र हैं। वस्तुओं में अपने आप में न सुख है न दुःख—क्योंकि वही वस्तु अलग-अलग व्यक्तियों को भिन्न प्रकार का अनुभव कराती है, और एक ही व्यक्ति को अलग-अलग समय में भिन्न अनुभव देती है। वस्तुएँ वैसे ही हैं जैसे हवा जो बादलों को हटाकर सूर्य का दर्शन कराती है। हमें लगता है कि हवा ने सूर्य दिखा दिया, पर वास्तव में सूर्य तो पहले से ही था—जिसके प्रकाश में बादल भी दिख रहे थे।
इसी प्रकार आनन्द भी सदा हमारे भीतर ही है, क्योंकि वह मानव का मूलस्वरूप है। कोई वस्तु, कोई सुख-साधन, कला या कविता—सब केवल साधन हैं जो क्षण भर के लिए दुःख और उदासी के बादलों को हटा देते हैं। तब जो आनन्द झलकता है, वह हर बार एक ही आत्मानन्द है, बस उसकी तीव्रता और अवधि अलग-अलग होती है।
अतः आत्मा आनन्दस्वरूप है।
एवं सच्चिदानन्दस्वरूपं स्वात्मानं विजानीयात् ।
इस प्रकार मनुष्य को जानना चाहिए कि उसका आत्मस्वरूप सत्-चित्-आनन्द है। अतः आत्मा का स्वरूप ही परम-सत्ता (सत्), परम-चेतना (चित्) और परम-आनन्द है। क्योंकि आत्मा ही ‘अहम्’ है, इसलिए मेरा मूलस्वभाव भी सच्चिदानन्द ही है।

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